फ़र्ज़

फ़र्ज़

किताबों के बीच रहने वाली मैं,
मुझे किताबें उबाऊ लगती हैं कहने वाला वह।
लोगों का ख़याल रखने वाली मैं,
देश को बचाने के लिए अपनी जान न्योछावर करने वाला वह।

शब्दों में भावनाएँ पिरोकर जीती मैं,
ख़ामोशी में भी वफ़ा लिख जाता वह।
सपनों को सहेजकर रखने वाली मैं,
हक़ीक़त के लिए हर सपना छोड़ आता वह।

हर दर्द को मुस्कान में छुपा लेती मैं,
हर ग़म को हिम्मत में बदल लेता वह।
मोहब्बत में जीने वाली मैं,
मोहब्बत को भी फ़र्ज़ पर लुटा देता वह।

कहता है—तुम्हारी टेढ़ी-मेढ़ी बातें समझ नहीं आतीं,
लेकिन मेरी हर ख़ामोशी समझ जाता है वह…