Poem
तेरे एक हाँ पर
मैं आऊँगी तेरी हर एक आवाज़ पर, पर तू मुझे बुलाए तो सही। मैं रुक जाऊँगी तेरे रोकने पर, पर तू रोके तो सही। मैं करूँगी इंतज़ार तेरे कहने पर, पर तू कहे तो
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मैं आऊँगी तेरी हर एक आवाज़ पर, पर तू मुझे बुलाए तो सही। मैं रुक जाऊँगी तेरे रोकने पर, पर तू रोके तो सही। मैं करूँगी इंतज़ार तेरे कहने पर, पर तू कहे तो
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बारिश से मेरा एक सवाल है: क्यों आते हो ऐसे कि पूरी दुनिया को दिखाते हो कि तुम रो रहे हो? क्यों आते हो ऐसे कि पूरी दुनिया को दिखाते हो कि तु
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प्रकृति में मैं और मैं ही प्रकृति में समाई हूँ। जिस्म से लेकर जान और रूह भी, मारुत में मिलाई हूँ। साँसों संग धड़कनों को भी श्रृंखला सा सजाई हू
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एक दोस्त है मेरी, थोड़ी खोई-खोई सी रहती है, कम बोलती है, ज़्यादा हँसती है। कभी-कभी चुप-चुप सी रहती है, और कभी-कभी इतना बोलती है कि चुप ही नहीं रहती। न जाने कौ
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कफ़न ओढ़े हुए हैं दुनिया काफ़ी दिनों से कुछ मासूम बच्चों की खिलखिलाहट-ए-आवाज़ों के साथ। चाँद का भी वो आख़िरी नहाना, मुर्दा सूरज का वो दफ़्नाना, ता
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ख़्वाबों को अकेले देखना और उन्हें सींचना रातों को करवटें बदलते हुए सोचना और सब पीछे छोड़ना ऐ हमसफ़र जो इस कश्मकश-सी ज़िंदगी में पाँव रखना चाहो तो आना आना हज़ारों बे
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ख्वाबों को पूरा करने की हकीकत क्या है अपनों से मिलने बिछड़ने की कीमत क्या है जो रोज़ अदा करते हैं बाज़ार-ए-दुनिया में उनसे पूछे की कलाकारों की बाजारों से
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खौफ खाना ज़िंदगी से, जिंदा से खौफ खाना। कुछ दिन मरते मरते जीना है, कुछ दिन जी कर मर जाना। अगर यही ज़िंदगी जीनी है, तो जीना क्यों है जाना? आओ एक जं
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एक गुल अब्बासी गुल । किसी रंगसाज की कृति? एक पद-चिन्ह के भीतर । किसी पदकमल की छाप? भू में सिमटी एक रचना। किसी गुलदान की नक़्क़ाशी? एक निराश्रित
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धुएँ मे उड़ रहा अस्तित्व हमारा, जीवन जीने का न कोई आधार रहा, भाग दौड़ मे ऐसे उलझे, जैसे तारो के जाल मे फँसा पंछी मदद को कुहार रहा, सहानुभू
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ज़मीं पर खड़े है सहारे लिए हैं, हमे तुम न काटो हम तुम्हारे लिए हैं। कहीं तो रुकोगे किसी झोपड़ी में, ये धरती ये अम्बर तुम्हारे लिए है। हमने किया है
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थोड़ी हैरान हूँ, वक्त के हालातों दबी थोड़ी परेशान हूँ औरों के लिए थोड़ी बोझ- सी बन गई इसलिए आज खुद के पैरो पे खड़ी हुई हूँ ।। यूँ तो बहुत समझदार हू